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कबीर दास जी का जीवन परिचय

संत कबीरदास (1398–1518) भारतीय भक्ति आंदोलन के सबसे प्रभावशाली और क्रांतिकारी संतों में से एक थे। उनकी वाणी आज भी उतनी ही प्रासंगिक और प्रेरणादायक है जितनी 600 साल पहले थी।

Question (Click to Flip)

कबीर को 'जुलाहा-संत' क्यों कहते हैं?

Answer

कबीर एक जुलाहे (बुनकर) परिवार में पले-बढ़े और आजीवन कपड़े बुनकर अपनी जीविका चलाते रहे। उन्होंने धर्म और संत बनने के लिए कभी अपना साधारण काम नहीं छोड़ा — इसीलिए उन्हें 'कर्मयोगी संत' या 'जुलाहा-संत' कहा जाता है।

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Key Facts

कबीरदास का निधन सन् 1518 में मगहर (उत्तर प्रदेश) में हुआ। उन्होंने जानबूझकर मगहर में देह त्यागी, क्योंकि उस समय एक मान्यता थी कि मगहर में मरने वाले को मोक्ष नहीं मिलता — कबीर इस अंधविश्वास को तोड़ना चाहते थे।

जन्म और प्रारंभिक जीवन

कबीरदास का जन्म सन् 1398 में काशी (वाराणसी), उत्तर प्रदेश में हुआ माना जाता है। उनके जन्म और जाति के बारे में कई किंवदंतियाँ हैं:

  • एक मान्यता के अनुसार वे एक विधवा ब्राह्मणी के पुत्र थे, जिसने उन्हें काशी के एक तालाब (लहरतारा तालाब) के किनारे छोड़ दिया था।
  • उन्हें एक जुलाहा (बुनकर) मुस्लिम दंपत्ति — नीरू और नीमा ने पाला।
  • इस तरह उनका जन्म और पालन-पोषण दोनों धर्मों — हिंदू और इस्लाम — की छाया में हुआ।

गुरु और शिक्षा

कबीरदास के गुरु स्वामी रामानंद थे। एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, कबीर पंचगंगा घाट की सीढ़ियों पर लेट गए। रामानंद जी जब भोर में स्नान के लिए उतरे तो उनका पैर कबीर पर पड़ा। रामानंद जी के मुंह से निकला 'राम! राम!' — और कबीर ने इसी को अपना दीक्षा मंत्र मान लिया।

रचनाएं और दर्शन

कबीर की रचनाओं का संग्रह 'बीजक' है, जिसके तीन भाग हैं:

  • साखी (दोहे के रूप में शिक्षाएं)
  • सबद (पद/गीत)
  • रमैनी (चौपाई छंद)

कबीर का दर्शन:

  • वे निर्गुण भक्ति (बिना आकार के ईश्वर की पूजा) के समर्थक थे।
  • हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रबल पक्षधर थे।
  • जाति-पाँति, अंधविश्वास, मूर्तिपूजा और धार्मिक आडंबर का कड़ा विरोध किया।
  • उनके प्रसिद्ध दोहे सामाजिक बुराइयों पर करारी चोट करते हैं: 'पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय'

Questions and Answers

कबीर को 'जुलाहा-संत' क्यों कहते हैं?+

कबीर एक जुलाहे (बुनकर) परिवार में पले-बढ़े और आजीवन कपड़े बुनकर अपनी जीविका चलाते रहे। उन्होंने धर्म और संत बनने के लिए कभी अपना साधारण काम नहीं छोड़ा — इसीलिए उन्हें 'कर्मयोगी संत' या 'जुलाहा-संत' कहा जाता है।

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