हास्य रस हिंदी के नौ रसों में सबसे आनंददायक रस है। इसका स्थायी भाव 'हास' (हँसी) है। जहाँ काव्य में विचित्र वेशभूषा, अनोखी हरकत, या हास्यजनक स्थिति का वर्णन हो और पाठक में हँसी उत्पन्न हो, वहाँ हास्य रस होता है। कबीर, भारतेंदु हरिश्चंद्र, और काका हाथरसी हास्य रस के प्रमुख कवि हैं।
हास्य रस का स्थायी भाव: हास (हँसी)
देवता: प्रमथ; वर्ण: श्वेत (सफेद)
आलम्बन: विचित्र वेशभूषा, मूर्खतापूर्ण व्यवहार
अनुभाव: हँसना, अट्टहास, पेट पकड़ना
प्रमुख कवि: काका हाथरसी, कबीर, भारतेंदु
6 भेद: स्मित से अतिहसित तक
व्यंग्यात्मक हास्य: समाज की बुराइयों पर हँसी
हरिशंकर परसाई: हिंदी व्यंग्य के पितामह
जब काव्य में किसी की विचित्र वेशभूषा, अनोखी हरकत, बेतुकी बात, या हास्यजनक परिस्थिति का वर्णन देखकर पाठक/श्रोता के हृदय में 'हास' नामक स्थायी भाव उत्पन्न हो और हँसी आए, तब हास्य रस होता है।
स्थायी भाव: हास (हँसी)
आलम्बन विभाव: विचित्र वेशभूषा वाला व्यक्ति, मूर्खतापूर्ण कार्य करने वाला, अनोखी चाल-ढाल
उद्दीपन विभाव: विकृत आकृति, अनुचित बातें, मसखरी, पागलपन की हरकत, मिलावटी बोली
अनुभाव: हँसना, अट्टहास करना, आँखें मिचमिचाना, पेट पकड़ना, लोटपोट होना
व्यभिचारी/संचारी भाव: हर्ष, चपलता, उत्सुकता, आलस्य, अवहेलना, निद्रा, उत्साह
हास्य रस के छह भेद होते हैं:
परीक्षाओं में इन भेदों से अधिक उदाहरण पर ध्यान दें।
उदाहरण 1 (कबीर): "बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय। जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।।" (यहाँ व्यंग्यात्मक हास्य है – स्वयं पर)
उदाहरण 2 (भारतेंदु हरिश्चंद्र): "अँगरेजी राज सुख साज सजे सब भारी। पैन-हाट चेयर टेबुल की बहार नियारी।।" (अंग्रेजी चीज़ों के प्रति व्यंग्यात्मक हास्य)
उदाहरण 3 (काका हाथरसी): "हम तो खुद भी नहीं जानते, हम क्या बोल गए। कविता की आड़ में अपनी, सच्चाई खोल गए।।"
उदाहरण 4 (परीक्षा के लिए सरल उदाहरण): "विग लगाए ऊपर से, नीचे गंजे सिर। सोचे लोग न देखें, पर देखें हर तरफ।।" – विचित्र वेशभूषा से हास्य।
हास्य रस में हँसी और मनोरंजन मुख्य है। व्यंग्य (Satire) हास्य रस का एक रूप है जिसमें समाज की बुराइयों पर तीखी हँसी होती है।
सौम्य हास्य: सबको हँसाने वाला, किसी को न चुभने वाला व्यंग्यात्मक हास्य: समाज की कमियों पर तीखा प्रहार
प्रमुख व्यंग्यकार: हरिशंकर परसाई, शरद जोशी, श्रीलाल शुक्ल (राग दरबारी)
पहचान कैसे करें:
गलती से बचें:
हास्य रस का स्थायी भाव 'हास' है। हास का अर्थ है हँसी। जब किसी विचित्र या हास्यजनक स्थिति को देखकर हृदय में हँसी उत्पन्न होती है, तब हास्य रस बनता है।
जब काव्य में किसी की विचित्र वेशभूषा, अनोखी हरकत, बेतुकी बात, या हास्यजनक स्थिति का वर्णन हो और पाठक में हँसी आए, तब हास्य रस होता है।
कबीर: 'बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय। जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।।' – यहाँ स्वयं पर व्यंग्यात्मक हास्य है। विचित्र वेशभूषा का उदाहरण: 'विग लगाए ऊपर से, नीचे गंजे सिर' – हास्यजनक वर्णन।
हास्य रस के छह भेद हैं: 1) स्मित (मुस्कान), 2) हसित (हल्की हँसी), 3) विहसित (खुलकर हँसना), 4) उपहसित (व्यंग्यात्मक हँसी), 5) अपहसित (जोरदार हँसना), 6) अतिहसित (अट्टहास)।
काका हाथरसी हास्य रस के प्रमुख कवि हैं। उन्हें हास्य कविता का सम्राट कहा जाता है। उनकी कविताओं में शुद्ध, निर्मल हास्य है जो सबको हँसाता है।
हास्य रस के अनुभाव: हँसना, अट्टहास करना, आँखें मिचमिचाना, पेट पकड़ना, लोटपोट होना, मुँह बनाना, हाथ-पैर पटकना।
व्यंग्य (Satire) हास्य रस का एक विशेष रूप है जिसमें समाज की बुराइयों, पाखंड और कमियों पर तीखी हँसी होती है। कबीर का व्यंग्य और हरिशंकर परसाई का व्यंग्य हास्य रस के अंतर्गत आते हैं।
हास्य रस के आलम्बन विभाव: विचित्र वेशभूषा वाला व्यक्ति, मूर्खतापूर्ण कार्य करने वाला, अनोखी चाल-ढाल वाला, बेतुकी बातें करने वाला।
हास्य रस के प्रमुख कवि: काका हाथरसी (शुद्ध हास्य), कबीर (व्यंग्यात्मक हास्य), भारतेंदु हरिश्चंद्र (सामाजिक व्यंग्य), गोपालप्रसाद व्यास, हरिशंकर परसाई (हिंदी व्यंग्य के पितामह)।
हास्य रस के देवता 'प्रमथ' हैं। इसका वर्ण 'श्वेत' (सफेद) है।
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