भयानक रस हिंदी के नौ रसों में एक है। इसका स्थायी भाव 'भय' है। जहाँ काव्य में भयंकर दृश्य, खतरनाक जीव, या भयावह परिस्थिति का वर्णन हो और पाठक के हृदय में भय उत्पन्न हो, वहाँ भयानक रस होता है। यह रस प्रकृति के भयंकर रूप, युद्ध के भीषण दृश्य, या राक्षसों के वर्णन में मिलता है।
भयानक रस का स्थायी भाव: भय
देवता: काल; वर्ण: कृष्ण (काला)
आलम्बन: शेर, सर्प, तूफान, राक्षस
अनुभाव: काँपना, पसीना आना, भागना
भयानक ≠ बीभत्स (बीभत्स में घृणा है, भय नहीं)
निराला: प्रकृति के भयंकर रूप के श्रेष्ठ चित्रकार
अंधकार, जंगल, तूफान – उद्दीपन विभाव
प्रमुख संचारी भाव: त्रास, शंका, जड़ता
जब काव्य में किसी भयंकर स्थिति, भयावह प्राणी, विनाशकारी प्रकृति, या डरावने दृश्य का वर्णन हो और पाठक/श्रोता के हृदय में 'भय' नामक स्थायी भाव उत्पन्न हो, तब भयानक रस होता है।
स्थायी भाव: भय
आलम्बन विभाव: शेर, सर्प, भूत, राक्षस, तूफान, अंधेरी रात, शत्रु, दुष्ट व्यक्ति
उद्दीपन विभाव: अँधेरा, सुनसान जंगल, चीख, मृत्यु का वातावरण, रात का अंधकार, भूतहा स्थान, तूफानी बादल
अनुभाव: काँपना, रोंगटे खड़े होना, पसीना आना, मुँह सूखना, आँखें फटना, भागना, छिपना, चीखना
व्यभिचारी/संचारी भाव: दीनता, जड़ता, शंका, आवेग, त्रास, विषाद, ग्लानि, मोह
उदाहरण 1 (सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'): "एक तरफ अजगर सोता है, एक तरफ मृग शावक रोता है। दोनों को परमात्मा जोता है, यह कैसा जग-मग भाता है।।"
उदाहरण 2 (जायसी – पद्मावत): "नागिन काढ़ि बाजी सो लाई। भुजंग आगि जानहु जहँ आई। जहँ जहँ पद धरे सेई ठाई। दव लाग जस उठि उठि धाई।।"
उदाहरण 3 (परीक्षा के लिए): "घोर अंधकार में चमकी बिजली, काली घटा ने धरती को ढकी। गर्जन-तर्जन से थर्राई धरती, भय से काँपी दिशाएं सकेरी।।" – यहाँ भीषण तूफान का वर्णन, भय स्थायी भाव।
उदाहरण 4: "उधर गरजती सिंधु लहरियाँ, इधर नदी ने घेरा। कटे न कट्टी रात अंधेरी, काटे न कट्टा डेरा।।"
भयानक रस:
बीभत्स रस:
रौद्र रस:
मुख्य नियम: 'किस भावना से' – डर लगे → भयानक; घृणा हो → बीभत्स; क्रोध हो → रौद्र।
पहचान:
भयानक रस का स्थायी भाव 'भय' है। जब किसी भयंकर दृश्य, खतरनाक प्राणी, या भयावह परिस्थिति से हृदय में भय उत्पन्न हो, तब भयानक रस होता है।
जब काव्य में किसी भयंकर स्थिति, भयावह प्राणी, या विनाशकारी दृश्य का वर्णन हो और पाठक के हृदय में भय स्थायी भाव जागृत हो, तब भयानक रस होता है।
'घोर अंधकार में चमकी बिजली, काली घटा ने धरती को ढकी। गर्जन-तर्जन से थर्राई धरती, भय से काँपी दिशाएं सकेरी।।' – यहाँ भीषण तूफान का वर्णन है, भय स्थायी भाव जागृत है।
भयानक रस में 'भय' स्थायी भाव है – खतरनाक जीव या तूफान से डर लगता है। बीभत्स रस में 'जुगुप्सा' (घृणा) स्थायी भाव है – घिनौने दृश्य, सड़न, गंदगी से घृणा होती है।
भयानक रस के आलम्बन विभाव: शेर, सर्प, भूत, राक्षस, तूफान, अंधेरी रात, शत्रु, दुष्ट व्यक्ति – ये सभी भय उत्पन्न करते हैं।
भयानक रस के अनुभाव: काँपना, रोंगटे खड़े होना, पसीना आना, मुँह सूखना, आँखें फटना, भागना, छिपना, चीखना। ये सभी भय की बाहरी अभिव्यक्ति हैं।
भयानक रस के उद्दीपन विभाव: अँधेरा, सुनसान जंगल, चीख, मृत्यु का वातावरण, रात का अंधकार, भूतहा स्थान, तूफानी बादल, बिजली की कड़क।
भयानक रस के देवता 'काल' (यम) हैं। इसका वर्ण 'कृष्ण' (काला) है।
भयानक रस की पहचान: 1) डर लगाने वाला वर्णन, 2) खतरनाक प्राणी या स्थिति, 3) काँपना, रोंगटे खड़े होने के अनुभाव, 4) अंधकार, जंगल, तूफान का भयावह वातावरण।
भयानक रस के प्रमुख कवि: सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, जयशंकर प्रसाद, तुलसीदास (राक्षसों का वर्णन), जायसी (पद्मावत)।
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