श्रृंगार रस को रसराज (रसों का राजा) कहा जाता है। यह प्रेम और सौंदर्य का रस है। इसका स्थायी भाव 'रति' (प्रेम) है। जहाँ नायक-नायिका के प्रेम का वर्णन होता है, वहाँ श्रृंगार रस होता है। यह हिंदी साहित्य का सबसे प्रमुख और व्यापक रस है।
श्रृंगार रस को 'रसराज' कहा जाता है
स्थायी भाव: रति (प्रेम)
दो भेद: संयोग श्रृंगार और वियोग श्रृंगार
आलम्बन: नायक और नायिका
प्रमुख कवि: सूरदास, बिहारी, मीराबाई, घनानंद
संयोग = मिलन का वर्णन; वियोग = विरह का वर्णन
श्रृंगार रस के देवता विष्णु/कामदेव हैं
वर्ण: श्याम (नील रंग)
जब काव्य में नायक-नायिका के मिलन या वियोग का वर्णन होता है और पाठक या श्रोता के हृदय में रति नामक स्थायी भाव जागृत होता है, तब श्रृंगार रस की उत्पत्ति होती है। 'श्रृंगार' शब्द का अर्थ है – सजावट, सौंदर्य, प्रेम। विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भावों के संयोग से रति स्थायी भाव पुष्ट होकर श्रृंगार रस बनता है।
स्थायी भाव: रति (प्रेम)
आलम्बन विभाव: नायक, नायिका
उद्दीपन विभाव: चाँदनी रात, फूलों की खुशबू, संगीत, एकांत स्थान, सुहावना मौसम, बसंत ऋतु
अनुभाव: मुस्कुराना, लजाना, आँखों का मिलना, सजना-संवरना, मिलने की उत्कंठा
व्यभिचारी/संचारी भाव: हर्ष, उत्सुकता, लज्जा, स्मृति, चिंता, स्वप्न, धृति
श्रृंगार रस के दो मुख्य भेद हैं:
संयोग श्रृंगार (Sanyog Shringaar): जब नायक और नायिका का मिलन होता है और उनके प्रेम-मिलन का वर्णन किया जाता है। इसे 'संभोग श्रृंगार' भी कहते हैं।
वियोग श्रृंगार (Viyog Shringaar): जब नायक-नायिका अलग हों और उनके विरह-दुख का वर्णन हो। इसे 'विप्रलंभ श्रृंगार' भी कहते हैं।
नोट: वियोग श्रृंगार में दुख होता है, फिर भी यह श्रृंगार रस है क्योंकि मूल भाव प्रेम (रति) ही है।
उदाहरण 1 (बिहारी): "बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाय। सौंह करे भौंहनि हँसे, देन कहे नटि जाय।।" स्पष्टीकरण: राधा ने कृष्ण की मुरली छुपा ली है, बातें करने के लिए। आँखों से मुस्कुराना, लजाना – ये अनुभाव संयोग श्रृंगार को प्रकट करते हैं।
उदाहरण 2 (सूरदास): "मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो। भोर भये गैयन के पाछे, मधुबन मोहि पठायो।।"
उदाहरण 3: "देखि सुदामा की दीन दशा, करुना करिके करुनानिधि रोये। पानी परात को हाथ छुयो नहिं, नैनन के जल सों पग धोये।।"
उदाहरण 1 (मैथिलीशरण गुप्त): "अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी। आँचल में है दूध और आँखों में पानी।।" स्पष्टीकरण: नारी के विरह-दुख का मार्मिक चित्रण – वियोग श्रृंगार।
उदाहरण 2 (जयशंकर प्रसाद): "नयनों के डोरे लाल हैं, पर नींद न आई। दिल में जलन है, व्याकुल है, रात गँवाई।।"
उदाहरण 3: "निसिदिन बरसत नयन हमारे। सदा रहति पावस रितु हम पर जबते श्याम सिधारे।।" (मीराबाई – कृष्ण के वियोग में)
श्रृंगार रस को रसराज इसलिए कहते हैं क्योंकि:
श्रृंगार vs करुण:
श्रृंगार vs भक्ति:
याद रखने योग्य तथ्य:
पहचान कैसे करें:
सामान्य गलती: वियोग श्रृंगार को करुण रस मत समझना। मूल भाव देखो – रति है तो श्रृंगार, शोक है तो करुण।
श्रृंगार रस को 'रसराज' (रसों का राजा) कहते हैं क्योंकि यह सबसे व्यापक और प्रभावशाली रस है। प्रेम मानव हृदय का सबसे स्वाभाविक भाव है, और श्रृंगार रस इसी भाव को अभिव्यक्त करता है। सभी रसों में श्रृंगार का अंश पाया जा सकता है।
श्रृंगार रस का स्थायी भाव 'रति' है। रति का अर्थ है – प्रेम, आसक्ति, अनुराग। यही भाव जब विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भावों से पुष्ट होकर रस-रूप ग्रहण करता है तो श्रृंगार रस बनता है।
संयोग श्रृंगार (Sanyog Shringaar): नायक-नायिका के मिलन, प्रेम-लीला, हर्षपूर्ण मिलन का वर्णन। वियोग श्रृंगार (Viyog Shringaar): नायक-नायिका के बिछड़ने, विरह-पीड़ा, अलगाव का दुखभरा वर्णन। दोनों में मूल स्थायी भाव 'रति' ही है।
संयोग श्रृंगार: 'बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाय। सौंह करे भौंहनि हँसे, देन कहे नटि जाय।।' (बिहारी) वियोग श्रृंगार: 'निसिदिन बरसत नयन हमारे। सदा रहति पावस रितु हम पर जबते श्याम सिधारे।।' (मीराबाई)
श्रृंगार रस में आलम्बन विभाव नायक और नायिका होते हैं। जिनके प्रेम का वर्णन किया जाता है वे आलम्बन कहलाते हैं। जैसे – राधा और कृष्ण, राम और सीता, या कोई भी प्रेमी जोड़ा।
श्रृंगार रस के उद्दीपन विभाव हैं: चाँदनी रात, फूलों की खुशबू, संगीत, एकांत स्थान, बसंत ऋतु, वर्षा ऋतु, सुहावना मौसम, मधुर गीत, प्रकृति का सौंदर्य, आदि। ये सभी प्रेम-भाव को उद्दीप्त करते हैं।
श्रृंगार रस के प्रमुख कवि: 1) सूरदास – राधा-कृष्ण लीला वर्णन, 2) बिहारी – बिहारी सतसई, 3) मीराबाई – कृष्ण-प्रेम और विरह, 4) घनानंद – वियोग श्रृंगार, 5) रसखान – कृष्ण भक्ति में श्रृंगार, 6) जयदेव – गीतगोविंद।
वियोग श्रृंगार और करुण रस में अंतर: वियोग श्रृंगार में प्रेमी-प्रेमिका के बिछड़ने का दुख होता है, लेकिन मूल भाव 'रति' (प्रेम) होता है। करुण रस में शोक मुख्य स्थायी भाव होता है जो किसी प्रियजन की मृत्यु, विपत्ति आदि से उत्पन्न होता है। यदि प्रेम के कारण दुख है – श्रृंगार; मृत्यु या विनाश से शोक है – करुण।
श्रृंगार रस के अनुभाव: मुस्कुराना, लजाना, आँखें मिलाना, सजना-संवरना, मिलने की उत्कंठा, गले लगना, स्पर्श करना, मधुर बोलना, आलिंगन, रोना (विरह में)। ये सभी प्रेम-भाव को बाहर व्यक्त करने वाली क्रियाएं हैं।
श्रृंगार रस का वर्ण 'श्याम' (नीला/काला रंग) है। इसके देवता विष्णु या कामदेव माने जाते हैं। भरत मुनि के नाट्यशास्त्र में श्रृंगार रस को सर्वोच्च स्थान दिया गया है।
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