भूस्खलन (Bhooskhalan) एक प्राकृतिक आपदा है जिसमें पहाड़ी या ढलानदार भूमि से मिट्टी, चट्टानें, मलबा या कीचड़ तेज़ी से नीचे की ओर खिसक जाता है। अंग्रेज़ी में इसे Landslide कहते हैं। भूस्खलन तब होता है जब किसी ढलान पर मिट्टी या चट्टानों को थामे रखने वाली शक्ति उन पर कार्य करने वाले गुरुत्वाकर्षण बल से कम हो जाती है। यह आपदा प्रायः भारी वर्षा, भूकंप, बाढ़ या मानवीय गतिविधियों के कारण होती है। भारत में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, पूर्वोत्तर राज्य और पश्चिमी घाट भूस्खलन की दृष्टि से अत्यधिक संवेदनशील क्षेत्र हैं।
भूस्खलन (Bhooskhalan) = Landslide — पहाड़ी ढलान से मिट्टी, चट्टान, मलबे का खिसकना।
सबसे सामान्य कारण: भारी वर्षा, भूकंप, वनोन्मूलन, अनियंत्रित निर्माण।
प्रकार: रॉकफॉल, मडफ्लो/डेब्री फ्लो, रोटेशनल स्लाइड, ट्रांसलेशनल स्लाइड।
भारत के संवेदनशील क्षेत्र: उत्तराखंड, हिमाचल, J&K, पूर्वोत्तर, पश्चिमी घाट।
2013 उत्तराखंड आपदा: केदारनाथ में भारी भूस्खलन — हज़ारों लोगों की मौत।
बचाव: वृक्षारोपण, उचित जल निकासी, रिटेनिंग वॉल, चेतावनी प्रणाली।
NDMA (राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण) भूस्खलन के दिशानिर्देश जारी करता है।
GSI (Geological Survey of India) भूस्खलन-प्रवण क्षेत्रों का मानचित्रण करती है।
भूस्खलन के प्रमुख कारण:
प्राकृतिक कारण: • भारी वर्षा: लगातार और अत्यधिक वर्षा से मिट्टी जल संतृप्त हो जाती है और ढलान से खिसकने लगती है — भूस्खलन का सबसे सामान्य कारण • भूकंप: भूकंप की कंपन तरंगें पहाड़ियों की ढलानों को अस्थिर कर देती हैं • हिमपात और हिम का पिघलना: बर्फ पिघलने से मिट्टी में अत्यधिक नमी आ जाती है • नदी/जल कटाव: नदियों द्वारा पहाड़ी आधार का कटाव ढलान को कमज़ोर करता है • ज्वालामुखी विस्फोट (कुछ क्षेत्रों में)
मानवीय कारण: • सड़क निर्माण: पहाड़ी ढलानों को काटकर सड़क बनाने से ढलान अस्थिर हो जाती है • अत्यधिक वनोन्मूलन (Deforestation): पेड़-पौधों की जड़ें मिट्टी को बांधे रखती हैं; वनों की कटाई से भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है • अनियोजित निर्माण: ढलानों पर भारी इमारतें बनाने से मिट्टी पर दबाव बढ़ता है • खनन और उत्खनन: पहाड़ों में विस्फोट और खुदाई से ढलानें कमज़ोर होती हैं • सिंचाई: अत्यधिक सिंचाई से मिट्टी में पानी रिस जाता है
भूस्खलन के प्रमुख प्रकार:
रॉकफॉल (Rockfall / चट्टान गिरना) • ऊँची चट्टानों से पत्थर अचानक टूटकर गिरते हैं • पहाड़ी सड़कों पर बहुत खतरनाक
मृदा प्रवाह / कीचड़ प्रवाह (Mudflow / Debris Flow) • भारी वर्षा में मिट्टी और मलबा तरल अवस्था में तेज़ी से नीचे बहता है • बहुत विनाशकारी — इसमें पानी, मिट्टी, पत्थर सब मिले होते हैं
रोटेशनल स्लाइड (Rotational Slide) • मिट्टी का एक बड़ा भाग घुमावदार सतह पर नीचे खिसकता है
ट्रांसलेशनल स्लाइड (Translational Slide) • मिट्टी या चट्टान का एक हिस्सा समानांतर सतह पर नीचे सरकता है
भू-प्रवाह (Earthflow) • गीली मिट्टी धीरे-धीरे बहती है — मडफ्लो से धीमी गति
भारत के संवेदनशील क्षेत्र: • उत्तराखंड (केदारनाथ, चमोली — 2013 की भीषण आपदा) • हिमाचल प्रदेश • जम्मू-कश्मीर और लद्दाख • पूर्वोत्तर राज्य (मेघालय, असम, मणिपुर, मिज़ोरम) • पश्चिमी घाट (केरल, महाराष्ट्र — 2018 केरल बाढ़ और भूस्खलन)
भूस्खलन के प्रभाव: • जन-धन हानि: मकानों, सड़कों, पुलों का विनाश • मानव जीवन का नुकसान: लोगों और पशुओं की मृत्यु • कृषि भूमि का नाश • नदियों में रुकावट → बाढ़ का खतरा • परिवहन और संचार व्यवस्था बाधित
बचाव के उपाय (Prevention):
भारत में भूस्खलन प्रबंधन: • राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) भूस्खलन के लिए दिशानिर्देश जारी करता है • Geological Survey of India (GSI) भूस्खलन-प्रवण क्षेत्रों का मानचित्रण करती है
भूस्खलन (Landslide) एक प्राकृतिक आपदा है जिसमें पहाड़ी ढलान से मिट्टी, चट्टानें, मलबा या कीचड़ अचानक तेज़ी से नीचे खिसक जाता है। यह तब होता है जब मिट्टी या चट्टान को थामने वाली शक्ति गुरुत्वाकर्षण बल से कम हो जाती है। भारी वर्षा, भूकंप और वनोन्मूलन इसके प्रमुख कारण हैं।
भूस्खलन के प्रमुख कारण हैं: (1) भारी वर्षा — सबसे सामान्य कारण; (2) भूकंप; (3) वनोन्मूलन (पेड़ों की कटाई); (4) पहाड़ी क्षेत्रों में अनियोजित निर्माण और सड़क निर्माण; (5) खनन और उत्खनन; (6) हिम का पिघलना। इनसे ढलान कमज़ोर हो जाती है और मिट्टी/चट्टान खिसकने लगती है।
भारत में भूस्खलन की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र हैं: उत्तराखंड (2013 में केदारनाथ में भीषण आपदा), हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख, पूर्वोत्तर राज्य (मेघालय, असम, मणिपुर, मिज़ोरम), और पश्चिमी घाट (केरल, महाराष्ट्र)।
भूस्खलन से बचाव के उपाय: (1) वृक्षारोपण — पेड़ों की जड़ें मिट्टी को बांधती हैं; (2) ढलानों पर उचित जल निकासी व्यवस्था; (3) रिटेनिंग वॉल (दीवारें) बनाना; (4) संवेदनशील क्षेत्रों में अनियोजित निर्माण पर रोक; (5) खनन नियंत्रण; (6) ISRO/IMD द्वारा पूर्व चेतावनी प्रणाली।
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