रस काव्य की आत्मा है। पाठक या श्रोता के मन में जो आनंद की अनुभूति होती है, उसे रस कहते हैं। हिंदी साहित्य में नव रस माने जाते हैं — श्रृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स, अद्भुत और शांत।
रस = काव्य पढ़ते समय मन में होने वाली आनंदानुभूति।
रस के चार अंग: स्थायीभाव, विभाव, अनुभाव, संचारी भाव।
हिंदी में नव रस (9 रस) होते हैं।
श्रृंगार रस का स्थायीभाव रति, वीर का उत्साह, करुण का शोक है।
रस को 'काव्य की आत्मा' कहा जाता है।
परिभाषा: काव्य पढ़ते या सुनते समय पाठक/श्रोता के मन में जो आनंदानुभूति होती है, उसे रस कहते हैं।
रस के चार अंग: १. स्थायीभाव — मन में सदा रहने वाला भाव २. विभाव — स्थायीभाव को जगाने वाला कारण (आलंबन + उद्दीपन) ३. अनुभाव — भाव प्रकट होने पर शरीर की क्रिया ४. संचारी/व्यभिचारी भाव — सहायक भाव जो आते-जाते रहते हैं
१. श्रृंगार रस — स्थायीभाव: रति उदाहरण: "बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाय। सौंह करे, भौंहनि हँसे, दैन कहे, नटि जाय।।" — बिहारी
२. हास्य रस — स्थायीभाव: हास उदाहरण: "नाना वाहन नाना वेषा। विहसे सिव समाज निज देखा।।" — तुलसीदास (शिव की अजीब बारात देखकर सबको हँसी आ गई।)
३. करुण रस — स्थायीभाव: शोक उदाहरण: "हाय! वह मेरे अरमानों का महल ढह गया, प्रियतम! कहाँ चले गए तुम, दिल बहुत जलता है।"
४. रौद्र रस — स्थायीभाव: क्रोध उदाहरण: "श्रीराम ने कहा — उठाऊँगा धनुष, मचाऊँगा हाहाकार, अगर नहीं छोड़ी सीता, तो जलेगी यह लंका सार।"
५. वीर रस — स्थायीभाव: उत्साह उदाहरण: "सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी, बूढ़े भारत में भी आई फिर नयी जवानी थी।" — सुभद्रा कुमारी चौहान
६. भयानक रस — स्थायीभाव: भय उदाहरण: "एक ओर अजगरसिंह लखि, एक ओर मृगराय। बिकल बटोही बीच ही, परयो मूरछा खाय।।"
७. बीभत्स रस — स्थायीभाव: जुगुप्सा उदाहरण: "सिर पर बैठ्यो काग, आँखि दोउ खात निकारत। खींचत जीभहिं स्यार, अतिहि आनंद उर धारत।।"
८. अद्भुत रस — स्थायीभाव: विस्मय उदाहरण: "देख यशोदा शिशु के मुख में, सकल विश्व की माया। चकित भई, गद्-गद् भई, अचरज मन में छाया।।" — सूरदास
९. शांत रस — स्थायीभाव: निर्वेद (वैराग्य) उदाहरण: "मन रे! तन कागद का पुतला। लागै बूँद बिनसि जाय छिन में, गर्व करत है क्यूँ इतना।।"
रस → स्थायीभाव श्रृंगार → रति हास्य → हास करुण → शोक रौद्र → क्रोध वीर → उत्साह भयानक → भय बीभत्स → जुगुप्सा अद्भुत → विस्मय शांत → निर्वेद
नोट: वात्सल्य रस को कुछ विद्वान दसवाँ रस मानते हैं — स्थायीभाव: वत्सलता।
काव्य पढ़ते या सुनते समय पाठक के मन में जो आनंद की अनुभूति होती है, उसे रस कहते हैं। आचार्य भरतमुनि ने कहा है — 'रसात्मकं वाक्यं काव्यम्।'
वीर रस का स्थायीभाव 'उत्साह' है। उदाहरण: 'सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी, बूढ़े भारत में भी आई फिर नयी जवानी थी।' — सुभद्रा कुमारी चौहान
"एक ओर अजगरसिंह लखि, एक ओर मृगराय। बिकल बटोही बीच ही, परयो मूरछा खाय।।" — स्थायीभाव: भय।
हास्य रस में स्थायीभाव 'हास' है और विचित्र/हास्यास्पद स्थिति होती है। करुण रस में स्थायीभाव 'शोक' है और किसी प्रिय की हानि या दुर्दशा का वर्णन होता है।
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