हिंदी और संस्कृत साहित्य में रस को 'काव्य की आत्मा' कहा जाता है। भरत मुनि ने अपने ग्रंथ नाट्यशास्त्र में मूल रूप से 8 रस बताए थे। बाद में शांत रस को जोड़कर कुल 9 रस माने जाने लगे।
कुल रस: 9
'रसराज': श्रृंगार रस
प्रथम उल्लेख: भरत मुनि का नाट्यशास्त्र
रस के अंग: स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव, संचारी भाव
| रस | स्थायी भाव | उदाहरण |
|---|---|---|
| श्रृंगार रस | रति (प्रेम) | नायक-नायिका का मिलन |
| हास्य रस | हास | मज़ाकिया कविताएँ |
| करुण रस | शोक | प्रियजन की मृत्यु |
| रौद्र रस | क्रोध | युद्ध का वर्णन |
| वीर रस | उत्साह | वीर सैनिक की कहानी |
| भयानक रस | भय | भूत की कहानी |
| बीभत्स रस | जुगुप्सा (घृणा) | घृणित दृश्य |
| अद्भुत रस | विस्मय | चमत्कारी घटना |
| शांत रस | निर्वेद (वैराग्य) | ध्यान/मोक्ष की भावना |
श्रृंगार रस को 'रसराज' (रसों का राजा) कहा जाता है क्योंकि यह सबसे व्यापक और प्रभावशाली रस माना जाता है।
हिंदी साहित्य में कुल 9 रस होते हैं: श्रृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स, अद्भुत, और शांत रस।
श्रृंगार रस का स्थायी भाव 'रति' (प्रेम) होता है।
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