रस (Ras) को काव्य की आत्मा कहा जाता है। भारतमुनि के नाट्यशास्त्र के अनुसार — 'विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः' — अर्थात् विभाव, अनुभाव और संचारी भाव के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है। रस वह आनंद है जो काव्य पढ़ते या सुनते समय पाठक/श्रोता को मिलता है। मूल रूप से 9 रस (नवरस) होते हैं।
रस = काव्य की आत्मा; पाठक/श्रोता को काव्य से मिलने वाला आनंद।
रस के चार अंग: स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव, संचारी भाव।
9 रस (नवरस): श्रृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स, अद्भुत, शांत।
श्रृंगार रस का स्थायी भाव = रति; वीर का = उत्साह; करुण का = शोक।
10वाँ रस: वात्सल्य (संतान के प्रति प्रेम) — सूरदास के पदों में।
भारतमुनि के नाट्यशास्त्र में रस का वर्णन सर्वप्रथम मिलता है।
रस की परिभाषा: 'काव्य पढ़कर या सुनकर पाठक/श्रोता को जो आनंद की अनुभूति होती है, उसे रस कहते हैं।'
रस के चार अंग:
नव रस (9 Ras) — सरल परिभाषा और उदाहरण:
| रस | स्थायी भाव | उदाहरण |
|---|---|---|
| श्रृंगार | रति (प्रेम) | 'मेरे तो गिरिधर गोपाल, दूसरो न कोई' — मीरा |
| हास्य | हास (हँसी) | 'रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून' (व्यंग्य) |
| करुण | शोक | 'हा राम! हा राम!' — माता कौशल्या का विलाप |
| रौद्र | क्रोध | 'अब जनि देइ दोसु मोहि लोगू।' — लक्ष्मण-परशुराम |
| वीर | उत्साह | 'वीर तुम बढ़े चलो, धीर तुम बढ़े चलो।' |
| भयानक | भय | 'एक ओर अजगर हैं, एक ओर मगर हैं।' |
| बीभत्स | जुगुप्सा (घृणा) | युद्ध में रक्त-माँस का वर्णन |
| अद्भुत | विस्मय | 'देखत हि हरि हेरत हेरत हेरत।' |
| शांत | निर्वेद (वैराग्य) | 'माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोय।' — कबीर |
वात्सल्य रस (10वाँ रस): • बाद में जोड़ा गया • स्थायी भाव: वात्सल्य (बच्चों/संतान के प्रति प्रेम) • उदाहरण: सूरदास के कृष्ण-बाल लीला पद
श्रृंगार रस — दो प्रकार: • संयोग श्रृंगार — प्रेमी-प्रेमिका का मिलन • वियोग श्रृंगार (विप्रलम्भ) — विरह/बिछड़ना
याद रखने का सरल तरीका: श्री हास कर वीर भय बी अद्भुत शा (श्रृंगार, हास्य, करुण, वीर, भयानक, बीभत्स, अद्भुत, शांत, रौद्र)
NCERT संदर्भ: Class 10 Hindi — काव्य-बोध
रस वह आनंद है जो काव्य पढ़कर या सुनकर मिलता है। नवरस हैं: श्रृंगार (रति), हास्य (हास), करुण (शोक), रौद्र (क्रोध), वीर (उत्साह), भयानक (भय), बीभत्स (घृणा), अद्भुत (विस्मय), शांत (निर्वेद)। रस के चार अंग हैं: स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव, और संचारी भाव। रस की अवधारणा भारतमुनि के नाट्यशास्त्र में मिलती है।
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