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रस और उनके स्थायी भाव – सरल उदाहरण (Class 10)

काव्य को पढ़ने या सुनने से जो आनंद प्राप्त होता है, उसे रस कहते हैं। रस को 'काव्य की आत्मा' माना जाता है। Class 10 CBSE हिंदी व्याकरण में रस एक महत्वपूर्ण विषय है।

Question (Click to Flip)

वीर रस का स्थायी भाव क्या है?

Answer

वीर रस का स्थायी भाव 'उत्साह' होता है।

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Key Facts

रस की संख्या: 9 (आधुनिक विद्वान 11 मानते हैं - वात्सल्य और भक्ति को जोड़कर)।

शृंगार रस: रति (प्रेम)।

वीर रस: उत्साह।

करुण रस: शोक।

हास्य रस: हास।

1. शृंगार रस (स्थायी भाव: रति/प्रेम)

जहाँ नायक-नायिका के प्रेम का वर्णन हो। उदाहरण: बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाय। सौंह करै भौंहनि हँसै, देन कहै नटि जाय॥ (राधा और कृष्ण का प्रेम)

विप्रलंभ (वियोग) शृंगार: हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी! तुम्ह देखी सीता मृगनैनी? (राम का सीता के लिए विलाप)

2. वीर रस (स्थायी भाव: उत्साह)

जहाँ वीरता, युद्ध या साहस का वर्णन हो। उदाहरण: बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

3. हास्य रस (स्थायी भाव: हास/हँसी)

जहाँ वेशभूषा, वाणी या आकृति देखकर हँसी आए। उदाहरण: बुरे समय को देखकर, गंजे तू क्यों रोय। किसी भी हालत में तेरा, बाल न बांका होय॥

4. करुण रस (स्थायी भाव: शोक)

जहाँ किसी प्रिय के नष्ट होने पर दुख का वर्णन हो। उदाहरण: हाय राम कैसे झेलें हम अपनी लज्जा अपना शोक। गया हमारे ही हाथों से अपना राष्ट्रपिता परलोक॥ (गांधीजी की मृत्यु पर)

अन्य महत्वपूर्ण रस

  • रौद्र रस (स्थायी भाव: क्रोध) - उस काल मारे क्रोध के तन कांपने उनका लगा।
  • वात्सल्य रस (स्थायी भाव: वत्सलता/बाल-प्रेम) - मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो।

Questions and Answers

वीर रस का स्थायी भाव क्या है?+

वीर रस का स्थायी भाव 'उत्साह' होता है।

'मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो' में कौन सा रस है?+

इस पंक्ति में श्रीकृष्ण के बाल-रूप का वर्णन है, इसलिए इसमें 'वात्सल्य रस' है।

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