हिंदी व्याकरण और काव्यशास्त्र (छंद ज्ञान) में 'चौपाई' एक बहुत ही महत्वपूर्ण और सबसे ज्यादा प्रयोग होने वाला मात्रिक छंद है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने 'रामचरितमानस' और 'हनुमान चालीसा' की रचना मुख्य रूप से चौपाई छंद में ही की है।
चौपाई को गाते समय एक लय (rhythm) और प्रवाह बनता है, जो इसे प्रार्थना और महाकाव्यों के लिए सबसे उपयुक्त बनाता है।
दोहा और चौपाई मिलकर ही अवधी और ब्रज भाषा के अधिकांश साहित्यों का निर्माण करते हैं।
चौपाई एक सम मात्रिक छंद है।
उदाहरण 1: (हनुमान चालीसा से) जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। (16 मात्राएँ) जय कपीस तिहुँ लोक उजागर।। (16 मात्राएँ) राम दूत अतुलित बल धामा। (16 मात्राएँ) अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा।। (16 मात्राएँ)
उदाहरण 2: (रामचरितमानस से) बंदउँ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा।। अमिय मूरिमय चूरन चारू। समन सकल भव रुज परिवारू।।
चौपाई के हर चरण में 16 मात्राएँ होती हैं। जबकि दोहा एक अर्ध-सम मात्रिक छंद है, जिसके पहले और तीसरे चरण में 13-13 मात्राएँ, और दूसरे तथा चौथे चरण में 11-11 मात्राएँ होती हैं।
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