बात अठन्नी की प्रश्न उत्तर — यह कहानी सुदर्शन (मूल नाम — बदरीनाथ) द्वारा रचित एक प्रसिद्ध हिन्दी कहानी है जो ICSE बोर्ड की साहित्य सागर पुस्तक में संकलित है।
कहानी का मुख्य पात्र रसीला है जो इंजीनियर बाबू जगत सिंह के घर में दस रुपये मासिक वेतन पर नौकर का काम करता है। रसीला का परिवार — बूढ़े पिता, पत्नी, एक लड़की और दो लड़के — गाँव में रहता है। रसीला अपनी पूरी तनख्वाह गाँव भेज देता है, फिर भी परिवार का गुजारा मुश्किल से होता है।
रसीला का मित्र रमज़ान पड़ोस में जिला मैजिस्ट्रेट शेख सलीमुद्दीन के यहाँ चौकीदार है। जब रसीला के बच्चे गाँव में बीमार पड़ते हैं और उसके पास पैसे नहीं होते, तो बाबू जगत सिंह पेशगी देने से मना कर देते हैं। ऐसे में रमज़ान अपनी जमा-पूँजी में से कुछ रुपये रसीला को उधार देता है।
एक दिन बाबू जगत सिंह रसीला को पाँच रुपये देकर मिठाई लाने भेजते हैं। रसीला साढ़े चार रुपये की मिठाई खरीदता है और बची हुई अठन्नी (आठ आने) रमज़ान को लौटाकर अपना कर्ज चुका देता है। जब जगत सिंह को मिठाई कम लगती है, तो वे हलवाई से पूछते हैं और रसीला की "चोरी" पकड़ी जाती है। जगत सिंह रसीला की पिटाई करते हैं और पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराते हैं।
मुकदमा मैजिस्ट्रेट शेख सलीमुद्दीन की अदालत में पेश होता है — वही शेख सलीमुद्दीन जिन्होंने खुद एक हजार रुपये की रिश्वत ली थी। मैजिस्ट्रेट रसीला को अठन्नी की हेरा-फेरी के जुर्म में छह महीने की सज़ा सुनाते हैं।
कहानी का संदेश यह है कि समाज में सम्पन्न वर्ग के लोग पाँच सौ और हज़ार रुपये की रिश्वत लेकर भी सम्मानित जीवन जीते हैं, जबकि एक गरीब नौकर मात्र अठन्नी के लिए छह महीने की जेल काटता है। लेखक ने इस कहानी के माध्यम से सम्पन्न वर्ग की हृदयहीनता, विपन्न वर्ग की आत्मीयता और न्याय व्यवस्था की विसंगतियों पर तीखा व्यंग्य किया है।
रसीला
कहानी का मुख्य पात्र। इंजीनियर बाबू जगत सिंह के घर दस रुपये मासिक वेतन पर नौकर। ईमानदार, मेहनती और अपने परिवार के प्रति समर्पित। अपनी पूरी तनख्वाह गाँव में बूढ़े पिता, पत्नी और बच्चों के लिए भेजता है। रमज़ान का कर्ज चुकाने के लिए मिठाई के पैसों में से अठन्नी बचाता है, जिसके कारण उसे छह महीने की सज़ा होती है। रसीला गरीबी और विवशता का प्रतीक है।
रमज़ान
शेख सलीमुद्दीन का चौकीदार और रसीला का सच्चा मित्र। साफ दिल का, सहानुभूतिपूर्ण और निःस्वार्थ व्यक्ति। खुद गरीब होते हुए भी रसीला को उसके बीमार बच्चों के इलाज के लिए पैसे उधार देता है। रमज़ान सच्ची मित्रता और विपन्न वर्ग की आत्मीयता का प्रतीक है।
बाबू जगत सिंह
पेशे से इंजीनियर और रसीला के मालिक। कठोर, हृदयहीन और स्वार्थी व्यक्ति। रसीला की तनख्वाह बढ़ाने से मना करते हैं, बीमार बच्चों के लिए पेशगी नहीं देते, और अठन्नी की हेरा-फेरी पर रसीला की पिटाई करके पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराते हैं। सम्पन्न वर्ग की हृदयहीनता का प्रतीक।
शेख सलीमुद्दीन
जिला मैजिस्ट्रेट जो रसीला को अठन्नी की चोरी के लिए छह महीने की सज़ा सुनाते हैं। स्वयं भ्रष्ट और रिश्वतखोर — एक हज़ार रुपये की रिश्वत लेने वाले। न्याय की कुर्सी पर बैठकर अन्याय करते हैं। भ्रष्ट न्याय व्यवस्था का प्रतीक।
"बात अठन्नी की" सुदर्शन द्वारा रचित कहानी है। रसीला इंजीनियर बाबू जगत सिंह के यहाँ दस रुपये मासिक वेतन पर नौकर है। उसका परिवार गाँव में अत्यंत कठिनाई से गुजारा करता है। जब रसीला के बच्चे बीमार पड़ते हैं तो जगत सिंह पेशगी देने से मना कर देते हैं। रमज़ान (शेख सलीमुद्दीन का चौकीदार) रसीला को कुछ रुपये उधार देता है। बाद में जगत सिंह रसीला को पाँच रुपये की मिठाई लाने भेजते हैं। रसीला साढ़े चार रुपये की मिठाई खरीदता है और बची अठन्नी रमज़ान को लौटाकर कर्ज चुका देता है। जगत सिंह को पता चलने पर वे रसीला की पिटाई करते हैं और पुलिस में रिपोर्ट लिखवाते हैं। मैजिस्ट्रेट शेख सलीमुद्दीन — जो स्वयं रिश्वतखोर हैं — रसीला को छह महीने की सज़ा सुनाते हैं।
इस कहानी का उद्देश्य समाज में व्याप्त रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार और सामाजिक विषमता को उजागर करना है। लेखक सुदर्शन ने दिखाया है कि सम्पन्न वर्ग के लोग सैकड़ों-हज़ारों रुपये की रिश्वत लेकर भी सम्मानित जीवन जीते हैं, जबकि एक निर्धन व्यक्ति मात्र अठन्नी की हेरा-फेरी के जुर्म में छह महीने का कारावास भोगता है। कहानी सम्पन्न वर्ग की हृदयहीनता, विपन्न वर्ग की आत्मीयता और न्याय व्यवस्था की विसंगतियों पर तीखा व्यंग्य करती है।
रसीला कहानी का मुख्य पात्र है जो इंजीनियर बाबू जगत सिंह के यहाँ दस रुपये मासिक वेतन पर नौकर है। वह ईमानदार और मेहनती है — अपनी पूरी तनख्वाह गाँव में अपने बूढ़े पिता, पत्नी और बच्चों के लिए भेजता है। वह अपने परिवार के प्रति अत्यंत समर्पित है। रमज़ान का कर्ज चुकाने के लिए उसने मिठाई के पैसों में से अठन्नी बचाई, जो दर्शाता है कि वह कर्ज का बोझ नहीं रखना चाहता था। रसीला गरीबी, विवशता और शोषित वर्ग का प्रतीक है।
रमज़ान शेख सलीमुद्दीन का चौकीदार और रसीला का सच्चा मित्र है। वह बहुत साफ दिल का, सहानुभूतिपूर्ण और निःस्वार्थ व्यक्ति है। खुद गरीब होते हुए भी उसने संकट के समय रसीला को पैसे उधार दिए ताकि वह अपने बीमार बच्चों का इलाज करा सके। रमज़ान सच्ची मित्रता, विपन्न वर्ग की आत्मीयता और मानवता का प्रतीक है। उसका चरित्र दर्शाता है कि गरीब लोगों में अमीरों की तुलना में अधिक सहानुभूति और मानवीय मूल्य हो सकते हैं।
बाबू जगत सिंह पेशे से इंजीनियर हैं और रसीला के मालिक हैं। वे कठोर, हृदयहीन और स्वार्थी व्यक्ति हैं। रसीला की तनख्वाह बढ़ाने से बार-बार मना करते हैं। जब रसीला के बच्चे बीमार होते हैं तो पेशगी देने से भी इनकार कर देते हैं। अठन्नी की हेरा-फेरी का पता चलने पर रसीला की पिटाई करते हैं और पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराते हैं। बाबू जगत सिंह सम्पन्न वर्ग की हृदयहीनता, क्रूरता और शोषण का प्रतीक हैं।
शेख सलीमुद्दीन जिला मैजिस्ट्रेट हैं जो रसीला के मुकदमे की सुनवाई करते हैं। वे भ्रष्ट, रिश्वतखोर और लालची व्यक्ति हैं — स्वयं एक हज़ार रुपये की रिश्वत ले चुके हैं। इसके बावजूद वे न्याय की कुर्सी पर बैठकर रसीला को मात्र अठन्नी की हेरा-फेरी के लिए छह महीने की कड़ी सज़ा सुनाते हैं। शेख सलीमुद्दीन भ्रष्ट न्याय व्यवस्था और दोहरे मापदंड का प्रतीक हैं।
रसीला ने अठन्नी की हेरा-फेरी इसलिए की क्योंकि उसे अपने मित्र रमज़ान का कर्ज चुकाना था। रमज़ान ने रसीला को उसके बीमार बच्चों के इलाज के लिए पैसे उधार दिए थे। जब बाबू जगत सिंह ने रसीला को पाँच रुपये की मिठाई लाने भेजा, तो रसीला ने साढ़े चार रुपये की मिठाई खरीदी और बची हुई अठन्नी रमज़ान को लौटा दी। यह चोरी नहीं बल्कि विवशता थी — रसीला के पास कर्ज चुकाने का और कोई रास्ता नहीं था।
कहानी में लेखक ने न्याय व्यवस्था की विसंगतियों पर तीखा व्यंग्य किया है। मैजिस्ट्रेट शेख सलीमुद्दीन, जो स्वयं एक हज़ार रुपये की रिश्वत ले चुके हैं, एक गरीब नौकर रसीला को मात्र अठन्नी की हेरा-फेरी के लिए छह महीने की सज़ा सुनाते हैं। इसका अर्थ है कि कानून गरीबों के लिए कठोर और अमीरों के लिए उदार है। बड़े-बड़े भ्रष्टाचारी सम्मानित जीवन जीते हैं जबकि एक विवश गरीब व्यक्ति जेल जाता है।
"बात अठन्नी की" कहानी के लेखक सुदर्शन हैं, जिनका वास्तविक नाम बदरीनाथ था। उनका जन्म 1896 में सियालकोट (वर्तमान पाकिस्तान) में हुआ था और मृत्यु 1967 में मुम्बई में हुई। वे प्रेमचंद युग के प्रमुख कहानीकार थे। हिन्दी और उर्दू दोनों भाषाओं पर उनका समान अधिकार था। उनकी प्रमुख रचनाओं में 'हार की जीत', 'सच का सौदा', 'अठन्नी का चोर', 'पृथ्वी-वल्लभ' आदि शामिल हैं। उनकी भाषा सहज, स्वाभाविक और मुहावरेदार है।
कहानी में सम्पन्न वर्ग (बाबू जगत सिंह, शेख सलीमुद्दीन) को हृदयहीन, स्वार्थी और भ्रष्ट दिखाया गया है — जगत सिंह अपने नौकर की विवशता नहीं समझते और सलीमुद्दीन खुद रिश्वतखोर होकर भी गरीब को सज़ा सुनाते हैं। इसके विपरीत विपन्न वर्ग (रसीला, रमज़ान) में सच्ची मित्रता, सहानुभूति और मानवीय मूल्य दिखाए गए हैं — रमज़ान खुद गरीब होते हुए भी रसीला की मदद करता है। लेखक ने स्पष्ट किया है कि गरीबों में अमीरों से अधिक आत्मीयता और मानवता होती है।
पाँच सौ और हज़ार की चोरी करने वाले चैन की नींद सोते हैं और मात्र अठन्नी की चोरी करने वाला छह महीने की सज़ा काटता है।
जिसके पास धन है, उसी के पास न्याय है।
गरीबी अपने आप में एक अपराध है।
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