वात्सल्य रस हिंदी साहित्य का एक विशेष रस है जिसे अनेक आचार्य 10वाँ रस मानते हैं। इसका स्थायी भाव 'वत्सलता' (ममता, प्रेम – विशेषतः माता-पिता का बच्चे के प्रति) है। सूरदास ने कृष्ण की बाललीला का वर्णन करके वात्सल्य रस को अमर कर दिया। बाल-वर्णन में माता-पिता के प्रेम, ममता, और स्नेह का जो चित्रण होता है, वह वात्सल्य रस है।
वात्सल्य रस का स्थायी भाव: वत्सलता (ममता, स्नेह)
इसे 10वाँ रस माना जाता है
सूरदास: 'वात्सल्य रस के सम्राट'
आलम्बन: शिशु, बालक (जिसे दुलारा जाए)
सूरसागर में यशोदा-कृष्ण का वात्सल्य अमर है
अनुभाव: गले लगाना, पुचकारना, दुलारना
वात्सल्य ≠ श्रृंगार (माता-पुत्र ≠ प्रेमी-प्रेमिका)
तुलसीदास ने भी रामचरितमानस में वात्सल्य का सुंदर वर्णन किया
जब काव्य में माता-पिता, परिजन, या गुरु का छोटे बच्चे/शिष्य के प्रति प्रेम और ममता का वर्णन हो और पाठक/श्रोता के हृदय में 'वत्सलता' (स्नेह, ममता) का भाव जागृत हो, तब वात्सल्य रस होता है।
'वत्स' का अर्थ है बछड़ा (और भावार्थ में छोटा बच्चा)। जिस प्रकार गाय अपने बछड़े से असीम प्रेम करती है, उसी प्रकार माँ का बच्चे के प्रति प्रेम वात्सल्य है।
स्थायी भाव: वत्सलता (ममता, स्नेह – विशेषतः माता-पुत्र प्रेम)
आलम्बन विभाव: छोटा बच्चा, शिशु, किशोर (जिसे प्यार किया जाए)
उद्दीपन विभाव: बच्चे की तुतलाहट, हँसी, खेलकूद, चाल-ढाल, मुखड़े की सुंदरता
अनुभाव: बच्चे को गले लगाना, पुचकारना, दुलारना, थपथपाना, आँखों से आँसू (खुशी के)
व्यभिचारी/संचारी भाव: हर्ष, उत्सुकता, आवेग, धृति, विस्मय, हास (बच्चे की बात पर)
उदाहरण 1 (सूरदास – सूरसागर): "यशोदा हरि पालने झुलावै। हलरावै, दुलरावै, मल्हावै जोई सोई कछु गावै।।" स्पष्टीकरण: यशोदा शिशु कृष्ण को पालने में झुलाती हैं, दुलारती हैं – माँ की ममता का चित्रण।
उदाहरण 2 (सूरदास): "मैया कबहिं बढ़ैगी चोटी? कितनो दूध पियत हौं, माखन खात हौं, दोऊ नैन मटाई।।" स्पष्टीकरण: बाल कृष्ण यशोदा से पूछते हैं कि उनकी चोटी बड़ी होगी या नहीं। यह बच्चे की मासूमियत का वर्णन है।
उदाहरण 3 (तुलसीदास – रामचरितमानस): "बाल बिनोद मोद मन माना। चंचल नयन, मुख छवि बिधि नाना।।" स्पष्टीकरण: बाल राम की क्रीड़ाओं का वर्णन – वात्सल्य रस।
उदाहरण 4 (महादेवी वर्मा – आधुनिक): "इसका रोम-रोम मेरे रोम से बंधा है, इसकी साँस मेरी साँस में सोती है।" – माँ का बच्चे के प्रति प्रेम।
वात्सल्य रस:
श्रृंगार रस:
मुख्य नियम: माता-बालक = वात्सल्य; प्रेमी-प्रेमिका = श्रृंगार।
सूरदास को 'वात्सल्य रस का सम्राट' कहा जाता है।
पहचान:
सावधान:
वात्सल्य रस का स्थायी भाव 'वत्सलता' है। वत्सलता का अर्थ है – ममता, स्नेह, विशेषतः माता-पिता का बच्चे के प्रति असीम प्रेम।
जब काव्य में माता-पिता, परिजन, या गुरु का छोटे बच्चे के प्रति ममता और स्नेह का वर्णन हो और पाठक के हृदय में वत्सलता उत्पन्न हो, तब वात्सल्य रस होता है।
सूरदास ने सूरसागर में यशोदा-कृष्ण के बीच माता-पुत्र प्रेम का अत्यंत मार्मिक और हृदयस्पर्शी वर्णन किया। बाल कृष्ण की मासूमियत, माँ की ममता, और उनके बीच के मधुर संवाद का ऐसा चित्रण किसी अन्य कवि ने नहीं किया।
सूरदास: 'यशोदा हरि पालने झुलावै। हलरावै, दुलरावै, मल्हावै जोई सोई कछु गावै।।' – यशोदा माँ शिशु कृष्ण को पालने में झुलाती हैं। यहाँ माँ की ममता का चित्रण है।
वात्सल्य: माता-पुत्र, बड़े-छोटे का प्रेम; निःस्वार्थ ममता। श्रृंगार: नायक-नायिका, प्रेमी-प्रेमिका का प्रेम; रति (आकर्षण)। यशोदा-कृष्ण = वात्सल्य; राधा-कृष्ण = श्रृंगार।
वात्सल्य रस के प्रमुख कवि: सूरदास (सर्वश्रेष्ठ – वात्सल्य सम्राट), तुलसीदास (बाल राम लीला), निराला (सरोज स्मृति)।
वात्सल्य रस को 10वाँ रस माना जाता है। परंपरागत नौ रसों (शृंगार से शांत) में यह शामिल नहीं था, लेकिन हिंदी के अनेक आचार्यों ने इसे अलग रस के रूप में मान्यता दी है।
वात्सल्य रस के अनुभाव: बच्चे को गले लगाना, पुचकारना, दुलारना, थपथपाना, आँखों में खुशी के आँसू, ममता से देखना।
'वत्स' का शाब्दिक अर्थ है बछड़ा (गाय का बच्चा)। भावार्थ में छोटे बच्चे या प्रिय जन के लिए प्रयोग होता है। जिस प्रकार गाय अपने बछड़े से प्रेम करती है, उसी प्रकार माँ का बच्चे से प्रेम 'वत्सलता' कहलाता है।
वात्सल्य रस की पहचान: 1) माता-पुत्र/पिता-पुत्र/गुरु-शिष्य प्रेम, 2) बच्चे की मासूमियत का वर्णन, 3) पुचकारना, दुलारना के अनुभाव, 4) बच्चे की तुतलाहट/खेल का वर्णन। 'बड़े का छोटे से निःस्वार्थ प्रेम' = वात्सल्य।
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